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 सावन में शिव का महत्व क्यों बढ़ जाता है, भक्तों की आस्था शिव पर सबसे ज्यादा क्यों है?

सावन में शिव का महत्व क्यों बढ़ जाता है, भक्तों की आस्था शिव पर सबसे ज्यादा क्यों है?

शिव के बारे में लोगों की कल्पना!

शिव कौन हैं? क्या वे भगवान हैं? या बस एक पौराणिक कथा? या फिर शिव का कोई गहरा अर्थ है, जो केवल उन्हीं के लिए उपलब्ध है जो खोज रहे हैं? भारतीय आध्यात्मिक संस्कृति के सबसे अहम देव, महादेव शिव, के बारे में कई गाथाएँ और दंतकथाएं सुनने को मिलती हैं। क्या वे भगवान हैं या केवल हिन्दू संस्कृति की कल्पना हैं? या फिर शिव का एक गहरा अर्थ है, जो केवल उन्हीं के लिए उपलब्ध है जो सत्य की खोज में हैं?

शिव शून्य हैं

आज के आधुनिक विज्ञान ने साबित किया है कि इस सृष्टि में सब कुछ शून्यता से आता है और वापस शून्य में ही चला जाता है। इस अस्तित्व का आधार और संपूर्ण ब्रम्हांड का मौलिक गुण ही एक विराट शून्यता है। उसमें मौजूद आकाशगंगाएं केवल छोटी-मोटी गतिविधियां हैं, जो किसी फुहार की तरह हैं। उसके अलावा सब एक खालीपन है, जिसे शिव के नाम से जाना जाता है। शिव ही वो गर्भ हैं जिसमें से सब कुछ जन्म लेता है, और वे ही वो गुमनामी हैं, जिनमें सब कुछ फिर से समा जाता है। सब कुछ शिव से आता है, और फिर से शिव में चला जाता है।

शिव अंधकार हैं

तो शिव को ‘अस्तित्वहीन’ बताया जाता है, एक अस्तित्व की तरह नहीं। उन्हें प्रकाश नहीं, अँधेरे की तरह बताया जाता है। मानवता हमेशा प्रकाश के गुण गाती है, क्योंकि उनकी ऑंखें सिर्फ प्रकाश में काम करती हैं। वरना, सिर्फ एक चीज़ जो हमेशा है, वो अंधेरा है। प्रकाश का अस्तित्व सीमित है, क्योंकि प्रकाश का कोई भी स्रोत, चाहे वो एक बल्ब हो या फिर सूर्य, आखिरकार प्रकाश बिखेरना करना बंद कर देगा। प्रकाश शाश्वत नहीं है। ये हमेशा एक सीमित संभावना है, क्योंकि इसकी शुरुआत होती है और अंत भी। अंधकार प्रकाश से काफी बड़ी संभावना है। अंधकार में किसी चीज़ के जलने की जरुरत नहीं, अंधकार हमेशा बना रहता है। अंधकार शाश्वत है। अंधकार सब जगह है। वो एक अकेली ऐसी चीज़ है जो हर जगह व्याप्त है।


पर अगर मैं कहूँ – “दिव्य अंधकार” लोग सोचते हैं कि मैं शैतान का उपासक हूँ। सच में, पश्चिम में कुछ जगहों पर ये फैलाया जा रहा है कि शिव राक्षस हैं! पर आप अगर इसे एक सिद्धांत के रूप में देखें तो आपको पूरे विश्व में सृष्टि की पूरी प्रक्रिया के बारे में इससे ज्यादा स्पष्ट सिद्धांत नहीं मिलेगा। मैं इस बारे में, बिना शिव शब्द बोले, दुनिया भर के वैज्ञानिकों से बातें करता रहा हूँ। वे आश्चर्य से भर उठते हैं, क्या ऐसा है? ये बातें पता थीं? कब? हमे ये हज़ारों सालों से पता हैं। भारत का हर सामान्य आदमी इस बात को अचेतन तरीके से जानता है। वे इसके बारे में बातें करते हैं, और वे इसका विज्ञान भी नहीं जानते।

आदियोगी शिव का अर्थ – पहले योगी और पहले गुरु

दूसरे स्तर पर, जब हम शिव कहते हैं, तो हम एक विशेष योगी की बात कर रहे होते हैं, वे जो आदियोगी या पहले योगी हैं, और जो आदिगुरू, या पहले गुरु भी हैं। आज हम जिसे योगिक विज्ञान के रूप में जानते हैं, उसके जनक शिव ही हैं। योग का अर्थ अपने सिर पर खड़े होना या अपनी सांस को रोकना नहीं है। योग, इस जीवन की मूलभूत रचना को जानने, और इसे अपनी परम संभावना तक ले जाने का विज्ञान और तकनीक है।

आदियोगी शिव का अर्थ – पहले योगी और पहले गुरु

योग विज्ञान का पहला संचार कांतिसरोवर के किनारे हुआ जो हिमालय में केदारनाथ से कुछ मील दूर पर स्थित एक बर्फीली झील है। यहां आदियोगी ने, इस आंतरिक तकनीक का व्यवस्थित विवरण अपने पहले सात शिष्यों को देना शुरू किया। ये सात ऋषि, आज सप्तर्षि के नाम से जाने जाते हैं। ये सभी धर्मों के आने से पहले हुआ था। लोगों के द्वारा मानवता को बुरी तरह विभाजित करने वाले तरीके तैयार किये जाने से पहले, मानव चेतना को ऊपर उठाने के सबसे शक्तिशाली साधनों को सिद्ध किया और फैलाया जा चुका था। आज मानवता इस तरह से विभाजित है, कि उसे फिर से एक करना लगभग असंभव लग रहा है।

शिव – एक ही शब्द के दो अर्थ

तो शिव शब्द “वो जो नहीं है” और आदियोगी दोनों की ही ओर संकेत करता है, क्योंकि बहुत से तरीकों से ये दोनों पर्यायवाची हैं। ये जीव, जो एक योगी हैं और वो शून्यता, जो सृष्टि का मूल है, दोनों एक ही है। क्योंकि किसी को योगी कहने का मतलब है कि उसने ये अनुभव कर लिया है कि सृष्टि वो खुद ही है। अगर आपको इस सृष्टि को अपने भीतर एक क्षण के लिए भी बसाना है, तो आपको वो शून्यता बनना होगा। सिर्फ शून्यता ही सब कुछ अपने भीतर समा सकती है। जो शून्य नहीं, वो सब कुछ अपने भीतर नहीं समा सकता। एक बर्तन में समुद्र नहीं समा सकता। ये ग्रह समुद्र को समा सकता है, पर सौर्य मंडल को नहीं समा सकता। सौर्य मंडल ग्रहों और सूर्य को समा सकता है, पर बाकी की आकाश गंगा को नहीं समा सकता। अगर आप इस तरह कदम दर कदम आगे बढ़ें, तो आखिरकार आप देखेंगे, कि सिर्फ शून्यता ही हर चीज़ को अपने भीतर समा सकती है। योग शब्द का अर्थ है मिलन। योगी वो है जिसने इस मिलन का अनुभव कर लिया है। इसका मतलब है, कम से कम एक क्षण के लिए, वो पूर्ण शून्यता बन चुका है।

शिव शब्द के दो अर्थ – योगी शिव और शून्यता – एक तरह के पर्यायवाची हैं, पर फिर भी वे दो अलग-अलग पहलू हैं। क्योंकि भारतीय संस्कृति द्वंद्व से भरी है, इसलिए हम एक पहलू से दूसरे पहलू पर आते-जाते रहते हें। एक पल हम परम तत्व शिव की बात करते हैं, तो अगले ही पल हम उन योगी शिव की बात करने लगते हैं, जिन्होंने हमें योग का उपहार दिया है।

शिव के बारे में लोगों की कल्पना!

यह अफसोस की बात है कि शिव का परिचय ज्यादातर लोगों को भारत में प्रचलित कैलेंडरों के जरिए ही हुआ है, जिसमें उन्हें भरे-भरे गाल वाले नील-वर्णी व्यक्ति के रूप में दिखाया गया है। उसकी वजह सिर्फ इतनी है कि कैलेंडर कलाकारों को इस चेहरे से अलग कुछ सूझा ही नहीं। अगर आप कृष्ण बनाने को कहेंगे, तो कलाकार उसके हाथ में एक बांसुरी थमा देंगे। राम बनाने को कहेंगे, तो उसके हाथ में धनुष दे देंगे। और अगर आप शिव बनाने को कहेंगे तो सिर पर चाँद बना देंगे, बस काम हो गया!